भारत क्यों छोड़ रहे हैं लाखों लोग? — 20 लाख भारतीयों ने छोड़ी नागरिकता | पूरी सच्चाई

भारत क्यों छोड़ रहे हैं लाखों लोग – भारतीय नागरिकता छोड़ने के कारण
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पिछले कुछ वर्षों में भारत से विदेशों को जाने और दूसरी राष्ट्र-नागरिकता अपनाने वाले लोगों की संख्या में वृद्धि देखी गई है। मीडिया-हैडलाइन अक्सर बड़े-बड़े आँकड़े दिखाती हैं — जैसे “20 लाख” — पर वास्तविकता समझने के लिए हमें सरकारी डेटा, प्रवासन रिपोर्ट और कारणों का ठोस विश्लेषण चाहिए। इस लेख में हम न केवल आँकड़े बताएँगे बल्कि वजहें, प्रभाव और आगे क्या हो सकता है — सब स्पष्ट और सरल भाषा में समझाएँगे।

सच्चे आंकड़े क्या कहते हैं?

सरकार के जवाब और सार्वजनिक रिकॉर्ड के अनुसार, हाल के वर्षों में जो सबसे भरोसेमंद मेट्रिक उपलब्ध है वह है “नागरिकता का त्याग (renunciation of Indian citizenship)” — यानी वो लोग जिन्होंने भारतीय नागरिकता छोड़कर दूसरी देश की नागरिकता ले ली। इन सरकारी आँकड़ों के अनुसार 2020 से 2024 तक वार्षिक आंकड़े कुछ इस तरह हैं: 2020 में करीब 85,256; 2021 में 1,63,370; 2022 में 2,25,620; 2023 में 2,16,219; और 2024 में 2,06,378 लोग। इन आंकड़ों के आधार पर पिछले पाँच सालों में करीब लगभग 9-10 लाख लोगों ने भारतीय नागरिकता त्यागी है — न कि 20 लाख। यह डेटा विदेश मंत्रालय (MEA) ने संसद में प्रस्तुत किया है।

दूसरी रिपोर्टें और अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाएँ बताती हैं कि विकसित देशों में नागरिकता लेने वाले भारतीयों की संख्या भी बढ़ी है — उदाहरण के लिए OECD रिपोर्ट के हवाले से 2023 में बहुत बड़ी संख्या ऐसे देशों में नागरिकता प्राप्त करने वालों की रिपोर्ट हुई है। इसका मतलब है कि कुछ वर्षों में प्रति वर्ष 2 लाख से अधिक भारतीयों का किसी न किसी रूप में नागरिकता-परिवर्तन दर्ज होना सामान्य हुआ है।

क्या “20 लाख” शीर्षक बिल्कुल गलत है?

सादा उत्तर: ज़रूरी नहीं कि यह पूरी तरह गलत हो, पर सीधे-सादे सरकारी आंकड़ों पर यह बड़ा-सा फ़िगर (20 लाख) पिछले पाँच वर्षों का आधिकारिक योग नहीं दिखाता। कभी-कभी रिपोर्ट्स में अलग-अलग मेट्रिक्स (जैसे सिर्फ OECD-countries में मिलने वाली नागरिकताएँ, या 2015-2019 सहित पुराना डेटा जोड़कर) जोड़े जाते हैं और शीर्षक बड़ा दिखता है। इसलिए स्पष्टता के लिए हमेशा स्रोत देखें।

लोग नागरिकता क्यों छोड़ रहे हैं? (मुख्य कारण)

डबल सिटिजनशिप नामुमकिन होना — भारत द्वैध नागरिकता की अनुमति नहीं देता। कई भारतीय विदेश में स्थायी रूप से बसना चाहते हैं; जब वे नई देश की नागरिकता लेते हैं तो उन्हें भारतीय नागरिकता छोड़नी पड़ती है। यह सबसे बड़ा कारण माना जाता है।

बेहतर आर्थिक अवसर और जीवन-स्तर — बेहतर नौकरी, स्वास्थ्य सुविधा, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा के कारण परिवार-स्तर पर स्थायी बसावट की योजना बनती है।

परिवार-जुड़ाव और प्रवास नीति — कई बार पति/पत्नी या बच्चों के कारण परिवारों को दूसरी नागरिकता अपनानी पड़ती है। कुछ देशों की इमिग्रेशन-नीति भी स्थायी आवास और नागरिकता के रास्ते आसान बनाती है।

शैक्षिक कारण — उच्च शिक्षा लेने के बाद कुछ छात्र वहीं जॉब और स्थायी निवास चुन लेते हैं।

अनिश्चितता या निजी कारण — व्यक्तिगत और पारिवारिक कारण, सुरक्षा चिंताएँ या बेहतर भविष्य-योजना भी भूमिका निभाते हैं। सरकार अक्सर कहती है कि अधिकांश कारण “व्यक्तिगत” होते हैं।

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क्या यह भारत के लिए बुरा है?

यह जटिल प्रश्न है और “हाँ/नहीं” में सरल उत्तर देना मुश्किल है:

नुकसान (Short-term): यदि प्रवास करने वाले युवा और हाई-स्किल्ड वर्कर्स का बहिर्गमन ज़्यादा हो तो घरेलू कुशल-श्रम और कुछ सेक्टरों में कमी आ सकती है।

लाभ (Long-term/Indirect): डायस्पोरा से भेजे जाने वाले रेमिटेंस, विदेशी नेटवर्क के माध्यम से व्यवसाय-विकास, और अंतरराष्ट्रीय सम्बन्धों में सहयोग जैसी सकारात्मक बातें भी रहती हैं। कई प्रवासी समय-समय पर अपने देश में निवेश करते हैं या विशेषज्ञता साझा करते हैं।

सरकार और नीतियाँ — क्या बदला जा सकता है?

डबल सिटिजनशिप पर बहस: भारत में द्वैध नागरिकता पर बहस समय-समय पर उठती रहती है — कुछ विशेषज्ञ और प्रवासी-समुदाय की माँग रहती है कि ‘वर्तमान प्रकार की NRI/PIO/OCI व्यवस्था’ को और मजबूत किया जाए या द्वैध नागरिकता पर विचार हो।

स्किल रिटेन्शन और नौकरी-अवसर: घरेलू अर्थव्यवस्था में ऐसे अवसर पैदा करना कि युवाओं को विदेशों की तुलना में बेहतर विकल्प दिखे।

डायस्पोरा-नीति: डायस्पोरा को जोड़ने के लिए विशेष योजनाएँ—जैसे निवेश-उत्साहवर्धन, आसान वोटिंग, और कर-सम्बंधी सुव्यवस्था—लाभकारी हो सकती हैं।

निष्कर्ष — वास्तविक बात क्या है?

सरकारी डेटा अनुसार पिछले पाँच सालों में लगभग 9-10 लाख लोगों ने भारतीय नागरिकता त्यागी; कुछ सालों में वार्षिक आंकड़े 2-2.25 लाख तक पहुँच गए। इसलिए “20 लाख” जैसा शीर्षक तभी सही लगेगा जब अलग-अलग मेट्रिक्स (या बड़ा-पुराना समय-सरणी) जोड़कर बात की जाए — पर आधिकारिक, ताज़ा MEA-डेटा सीधे 20 लाख का आंकड़ा नहीं दिखाता।

मुख्य कारण व्यक्तिगत और आर्थिक हैं; और नतीजा मिश्रित — कुछ नुक़सान, पर बड़े फायदे भी हैं। नीति-निर्माताओं के लिए सही तरीका यह होगा कि वे डायस्पोरा से जुड़े डेटा और प्रेरणाओं को समझ कर लक्षित नीतियाँ बनाएँ।